Saturday, 25 May 2024

  समय हाथ से निकलता जा रहा है।

 सम्राट अशोक के चक्र और चतुर्मुख सिंह के निशानों को हमारे देश ने बड़े गर्व से राष्ट्रीय चिन्ह बनाया हुआ है। क्या यह मात्र प्रदर्शन के लिए अथवा सजावट की वस्तु बन कर रह गए हैं ? चाणक्य, चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक आदि कुछ नामों को तो  बहुत से देशवासियों ने सुन रखा होगा परन्तु इन लोगों से कुछ किसी ने सीखने समझने की कभी कोशिष भी की है ? ऐसे चिन्हों का प्रदर्शन मात्र दिखावे के लिए नहीं होता। एक मकसद होता है कि देश के लोग अपने उस समय के गौरवशाली इतिहास और देश के ऐसी उत्तम रत्नो से कुछ प्रेरणा ले और स्वयं को जागृत करें। देश वासियों को ऐसी महान विभूतिओं से कुछ प्रेरणा ले अपने समाज और देश को एकता के सूत्र में बांध कर सुरक्षित और शक्तिशाली बनाये रखने में अपना पूर्ण सहयोग देना चाहिए। धर्म, जाती-विरादरी,बड़े-छोटे अथवा अमीर-गरीब, राजनीतिक भेद भाव से हटके, प्रमुखता का भाव एक ही होना चाहिए, समाजिक एकता और देश प्रेम। कितने देशवासी इस बिचार से सहमत हैं ? भारत भूमि के गौरव सम्राट अशोक के बाद कोई ऐसा राजा देश में नहीं हुआ कि जिसने देश को एकता की भावना में बांध कर देश की सीमांओं को सुरक्षित रखने में सफलता प्राप्त की हो। अशोक की मौत के ५० बर्ष बाद ही स्वार्थी लोगों ने साम्राज्य को खंडित करना शुरू कर दिया था। जिसके हाथ जितना लगा, छोटे छोटे राज्य स्थापित करने शुरू कर दिए थे और अपने राज्यों की सीमायें बढ़ाने के लिये आपस में ही लड़ते झगड़ते रहते थे। भारत देश के अन्दर छोटे छोटे राज्य स्थापित होने का क्रम शुरूहो गया था और चलता रहा। इन रजवाड़ों में शायद ही कोई अपने राज्य की जनता की सुख सुविधाओं के बारे में सोचने वाला रहा होगा। अधिकतर रजवाड़े अपनी शाही ठाठ-बाठ और सुख सुविधाओं पर ही ध्यान देते थे। देश की जनता को दव के रहना पड़ता था और दो जून की रोटी के लाले पड़े रहते थे। सनातन वर्णाश्रम समाप्त होने लगा था। 'जैसा काम वैसा नाम' तब इस तरह जाती प्रथा शुरू हो गई थी। देश में समाज चार वर्ण की जगह अनेकों जातियों में जाना जाने लगा था। भारत के सतयुगी इतिहास में चार वर्णों का वर्णन आता है: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। परन्तु अब  विभिन्न सेवा कार्यों के अनुसार अनेकों नामों से जातियों का उदय होने लगा था।  इसे कलयुग का प्रभाव ही समझो। भारत की इस भूमि पर लोग अपने ही देश में गुलामों की तरह रहने को मज़बूर होने लगे थे। रजवाड़ों की स्वार्थी बुद्धि और आम जनता-जनार्धन की कमजोरी के कारण देश-प्रेम का महत्व कमजोर पड़ गया था। इसी कारण शायद अर्ब के मुस्लिम लुटेरों को भारत में आकर लूट मचाने से कोई रोकने में समर्थ नहीं हो सका था। 

जहाँ राज्य मजबूत होगा और जनता-जनार्धन का सहयोग होगा वहीं सफलता संभव हो सकती है।  

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