धर्म और भक्ति को धार्मिक लोग एक ही समझ लेते हैं परन्तु दोनो में समझेंगे तो बड़ा अन्तर है।
देश-दुनिया के अंदर समय-गति के साथ अनेकों विभिन्न सोच-विचार के लोग पैदा हुए हैं और उन्होने अपनी सोच समझ के आधार पर कुछ धार्मिक मान्यताओं का आम लोगों में प्रचार और प्रसार भी किया अतः बहुत से लोग आप से सहमत हो आपके साथ हो गए। ऐसे ही अनेकों एक जैसी मान्यता वाले ग्रुप अथवा धार्मिक संगठन बनते गए। इस प्रचार और प्रसार में देश की सीमा और भाषा का बड़ा रोल रहता आया है।
यही कारण है कि इस पृथ्वी पर यह समझते हुए भी कि प्रमुख शक्ति जो सब को रचती है और सब का पालन व सञ्चालन करती है,"एक ही है" परन्तु फिर भी अनेक रूप और नामों से मान्यतायें हो रही हैं। मान्यता जो और जैसे भी हो रही है ठीक है, परन्तु अपनी मान्यता को दूसरी मान्यता वाले लोगों पर उनकी इच्छा के विरुद्ध ज़बरदस्ती उन पर थोपना तो तर्क-संगत नहीं माना जा सकता।
धार्मिक मान्यताओं ने संसार भर में आम जन-जीवन को बहुत प्रभावित किया हुआ है। आम लोग भगवान के प्रति अपनी आस्था को ही धर्म मान लेते हैं।
धर्म के बारे में हम लोग पूर्णतः भ्रमित हैं।
प्रत्येक समाज अथवा देश में दो तरह के लोग होते हैं। एक आस्तिक, जो किसी रूप में एक दिव्य शक्ति, जो संसार की व्यवस्था, भरण-पोषण और जीवन-मरण आदि को संभालती है और संचालन करती है, उस दिव्य शक्ति को किसी न किसी नाम-रूप से पूजते हैं। आस्तिक लोग धार्मिक होते हैं और अपने मान्य देव के लिए आस्था का भाव रखते हैं।
दूसरे वोह लोग जो नास्तिक कहलाते हैं। यह लोग किसी दिव्य शक्ति अथवा इसके प्रभाव को नहीं मानते और ना ही इस के लिए कोई श्रद्धा भाव रखते हैं। खाओ-पीओ और अपनी तरह से जीवन का आनंद लो, ऐसे लोग यहीं तक अपनी समझ व सोच रखते हैं।
धर्म और भक्ति का जो समबन्ध है यह बहुत गहरा है। कारण कि धार्मिक व्यक्ति के मन में ही पूजा प्रार्थना का भाव उपजता है और वोह अपने प्रभु की अपनी समझ स्मर्थता के अनुसार बन्दना पूजा भी करता है। यह पूजा बन्दना का भाव मनुष्य के मन के अंदर जागृत हुई भक्ति भाव के कारण ही उपजता है।
धर्म को मानने वाले लोग एक सुनिश्चित मान्यता के प्रति निष्ठावान हो उसमें विश्वास करने वाले होते हैं। गृहस्थ अथवा परिवार के लोग अधिकतर किसी धार्मिक मान्यता पर चलते हुए अपने देवी-देवों में श्रद्धा भाव रखते हुए पूजा अर्चना करते हैं। श्रद्धा के अनुसार अपने पूजा-स्थलों जैसे मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों में भी जाते हैं। ऐसे लोग धार्मिक होते हैं और इन में अपने देव के लिए भगती भाव भी होता है।
आप धार्मिक हैं और अपने मान्य धर्म के अनुसार अपने देव की समय समय पूजा बंदना भी करते हैं, बहुत अच्छी बात है।
बहुत से प्राणी धार्मिक विश्वास वाले तो होते हैं
परन्तु उनके स्वाभाविक कर्म ठीक नहीं होते। यदि आपके कर्मों में खोट है तो आपकी पूजा वंदना निष्क्रिय हो जाती है। यदि आप
के कर्म शुभ और सात्विक हैं तो आप अपने इष्टदेव से दूर नहीं।
प्रभु कृपा प्राप्त करने के लिए अच्छी धार्मिक मान्यता के साथ सात्विक कर्म का होना भी अति आवश्यक है।
यहाँ धर्म और कर्म के सम्बन्ध को समझना भी अत्यंत आवश्यक है।
सृष्टि रचना से भी पहले प्रजापिता ब्रह्मा जी ने मानव कल्याण के लिए जो आवश्यक हो सकता था वोह चार वेदों के रूप में भाषा-बद्ध कर दिया था।
मनुष्य के लिए कर्म क्या होता है और धर्म से कर्म का क्या सम्बन्ध बनता है, समझने के लिए हमें अति उत्तम पवित्र ग्रन्थ, "श्री मद्भगवत गीता" जो स्वयं श्री हरी मुख वाणी है, जिसका प्रादुर्भाव भगवान श्री विष्णु के सोलह कला सम्पूर्ण अवतार वासुदेव श्री कृष्ण के श्री मुख से कुरूक्षेत्र की पवित्र भूमि पर कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत का युद्ध शुरू होने के समय हुआ था।
युद्ध के लिए कौरवों और पांडवों की सेनायें आमने
सामने थी। उस युग में युद्ध आमने-सामने का होता था। धनुष-तीर, खड्ग, तलवार, गदा और
भाले जैसे शस्त्रों से ही आमने-सामने होकर लड़ा जाता था। परन्तु भीष्म पितामह, गुरु
द्रोणाचार्य, अर्जुन और कर्ण जैसे बहुत से वीर पुरुष धनुष से छोड़े जाने
वाले दिव्य और बड़े विध्वंसक शस्त्रों का प्रयोग भी करना जानते थे।
अर्जुन भगवान श्री कृष्ण की भुआ "कुंती" के
पुत्र थे और दोनों में बहुत स्नेह भी था। श्री कृष्ण महाभारत युद्ध में अर्जुन के
अनुरोध पर अर्जुन के रथ के सारथी बने थे।
महाभारत युद्ध शुरू होने के समय युद्ध भूमि में जब
अर्जुन ने अपने सामने युद्ध के लिए खड़े हुए अपने गुरु द्रोणाचार्य, परिवार
के सबसे बड़े वृद्ध पुरुष पितामह भीष्म को और दूसरे सभी परिवारजनों को भी देखा तो
उसके अंग शिथिल पड़ गए थे और उसने अपने ही बड़ों और परिवारजनों के साथ युद्ध करने से
साफ मना कर दिया था।
ऐसे समय में अर्जुन को कर्म और धर्म का ज्ञान देते
हुए समझाया था कि समय के अनुसार उसका कर्म युद्ध करना है इसमें किसी भी तरह से
अधर्म नहीं होगा।
रिश्तों को अपमानित किया गया था और अधिकारों का हनन किया गया था इस के लिए तो यह
युद्ध हो रहा था। अब तो सब युद्ध भूमि में जो सामने खड़े हैं, दुश्मन
अथवा प्रति द्वंदी ही हैं। इस लिए समय के अनुसार अपना कर्तव्य पालन करते हुए, बिना
कोई और बिचार करते हुए, युद्ध करो।
ऐसे समय में श्री कृष्ण ने अर्जुन के अनुरोध पर और
उसे विश्वास दिलाने और उस के भ्रमित मन को शांत करने के लिए अपने दिव्य विश्व
स्वरूप के दर्शन भी करा दिए थे। अब अर्जुन को विश्वास हो गया था कि श्री कृष्ण
स्वयं पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर हैं और उस ने फिर अपनी भूल और अनभिज्ञता के लिए क्षमा
याचना भी की और उनकी आज्ञा का पालन करते हुए युद्ध भी
किया था।
पृथ्वी लोक को भगवान ने कर्म भूमि की संज्ञा देकर मानव को यहाँ का निवासी बनाया है। मानव जन्म को एक दुर्लभ जन्म बताया गया है क्यों कि मनुष्य रूप में जन्म लेने वाला प्राणी ही अपने कर्मों का सुधार कर स्वर्गलोक अथवा जन्म-मरण से मुक्ति देने वाली सद्गति को प्राप्त कर सकता है। जन्म-मरण के चक्र से निकलने का मात्र एक रास्ता मानव जीवन से हो कर ही निकलता है। देव लोक के निवासी देवता भी सीधे सद्गति अथवा जीवन-मरण से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। पृथ्वी लोक पर मानव रूप में किये गए अच्छे पुण्य कर्मों के फल स्वरूप स्वर्गादि ऊपर के लोकों में सुनिश्चित समय के वहां प्राप्त सुख भोग कर इन को भी कर्म अनुसार आगे किसी योनि में जन्म लेना ही पड़ता है। इसी लिए कहते हैं कि मानव योनि में जन्म लेने के
लिए तो देवता भी तरसते हैं।
मनुष्य के लिए अच्छे आचरण और अच्छे कर्मों का होना अति आवश्यक है।
अन्तर-आत्मा से पवित्र, स्वाभाविक सद्गुण होने से किसी भी प्राणी का प्रभु के साथ एकत्व भाव हो जाता है।
स्वाभाविक सद्गुण प्रभु की कृपा से पिछले जन्मों के अच्छे कर्मों के अनुसार जन्मगत भी होते हैं जो व्यक्तिगत जीवन को जन कल्याण, सर्व हित, सद्भावना और प्रभु भक्ति के लिए प्रेरक बने रहते हैं। मनुष्य का जन्म चौरासी लाख योनिओं में एक मात्र शरीर है जिस में अपने अच्छे कर्मों से अपना उद्धार कर सकता है और सद्गति भी प्राप्त कर सकता है।
कभी कभी किसी के ऊपर प्रभु कृपा ऐसी भी हो जाती है कि लाख बुरे में एक अच्छे कर्म के कारण जीवन में किसी सत्पुरुष के सौजन्य से जीवन में कर्म सुधार के लिए मेल बन जाता है। किसी साधु पुरुष के ज्ञान बिचार मन में उतर जाने से दुर्भावनाओं और दुष्कर्मों से मनुष्य मानसिक तौर से हटने लग जाता है।
और भी अधिक प्रभु कृपा समझनी चाहिए यदि कोई सिद्ध समाधी सतगुर अपनी शरण में ले लें। सिद्ध समाधी साधु महात्मा अपनी भगति तप-साधना के फल स्वरूप सिद्धि प्राप्त कर त्रिकाल दर्शी व अन्तर्यामी हो गए होते हैं और जन कल्याण के लिए भगतों की अंतरात्मा में प्रभु की भगति के प्रति भावनाओं को जगा कर सद्गति प्रदान करने वाले होते हैं।