पृथ्वी लोक कर्म भूमि:
पृथ्वी लोक को भगवान ने कर्म भूमि की संज्ञा देकर मानव को यहाँ का निवासी बनाया
है। मानव जन्म को एक दुर्लभ जन्म बताया गया है क्योंकि मनुष्य रूप में जन्म लेने
वाला प्राणी ही अपने कर्मों का सुधार कर स्वर्गलोक अथवा जन्म-मरण से मुक्ति देने
वाली सद्गति को प्राप्त कर सकता है। जन्म-मरण के चक्र से निकलने का मात्र एक
रास्ता मानव जीवन से हो कर ही निकलता है। देव लोक के निवासी देवता भी सीधे सद्गति
अथवा जीवन-मरण से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। पृथ्वी लोक पर मानव रूप में किये
गए अच्छे पुण्य कर्मों के फल स्वरूप, स्वर्गादि ऊपर के लोकों में सुनिश्चित समय के
लिए वहां प्राप्त सुख भोग कर, इनको भी कर्म अनुसार आगे किसी योनि में जन्म लेना
पड़ता है।
इसी लिए कहते हैं की मानव योनि में जन्म लेने की लिए तो
देवता भी तरसते हैं।
अच्छे कर्म करने वाले मनुष्य
योनि के लोग, पृथ्वी पर अपना जीवन-काल पूरा कर लेने के बाद पृथ्वी के ऊपर के
स्वर्ग आदि लोकों में वहां का सुख भोगने के लिए एक सुनिश्चित समय के लिए ले जाये
जाते हैं। फिर उनका आगे की योनि में जन्म होता है और मानव जीवन में एकत्रित किये
सभी अच्छे-बुरे कर्मों का हिसाब आगे चलता रहता है।
मनुष्य के लिए कर्म क्या
होता है और धर्म से कर्म का क्या सम्बन्ध बनता है ऐसे समझने के लिए हमें अति उत्तम
पवित्र ग्रन्थ, "श्री मद्भगवत गीता" जो स्वयं श्री हरीमुख बाणी है, जिस का प्रादुर्भाव
भगवान श्री विष्णु के सोलह कला सम्पूर्ण अवतार वासुदेव श्री कृष्ण के श्री मुख से
कुरूक्षेत्र की युद्ध भूमि पर कौरवों
और पांडवों के बीच महाभारत का युद्ध शुरू होने के समय हुआ था।
युद्ध के लिए कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने सामने
थी। उस बड़े महाभारत युद्ध में श्री कृष्ण ने स्वयं शस्त्र का प्रयोग नहीं करना था।
उन्होंने अर्जुन की इच्छा के अनुसार उसका सारथी बनना स्वीकार किया था और वही वोह
कर रहे थे। श्री कृष्ण अर्जुन के सारथी बन उस के रथ के घोड़ों को हाँक रहे थे।
उस युग में युद्ध आमने-सामने का होता था। तीर, तलवार, गदा और भाले जैसे अनेकों
शस्त्रों से ही आमने-सामने होकर लड़ा जाता था। परन्तु भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, अर्जुन
और करण जैसे बहुत से वीर पुरुष धनुष से छोड़े जाने वाले दिव्या और बड़े विध्वंसक शस्त्रों
का प्रयोग भी करना जानते थे।
महाभारत युद्ध शुरू होने के समय युद्ध भूमि में जब
अर्जुन ने अपने सामने युद्ध के लिए खड़े हुए अपने गुरु द्रोणाचार्य, परिवार के सबसे बड़े वृद्ध पुरुष पितामह भीष्म को और दूसरे सभी परिवारजनों को
भी देखा तो उसके अंग शिथिल पड़ गए थे और उसने अपने ही बड़ों और परिवारजनों के साथ
युद्ध करने से साफ मना कर दिया था।
अर्जुन भगवान श्री कृष्ण की भुआ "कुंती" के
पुत्र थे और दोनों में बहुत स्नेह भी था।
श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्म और कर्तव्य का ज्ञान
देते हुए समझाया था कि समय और स्थिति के अनुसार मनुष्य को अपना फैसला करना चाहिए।
रिश्तों के मोह से ऊपर उठ कर समय के अनुसार कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
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