कलयुग में मनुष्य धर्म
कलियुग का नाम चार युगों की युग गणना में चौथे स्थान
पर आता है | भारत देश में ही नहीं बल्कि पूरी पृथ्वी की मानव जातिओं में धर्म का
सदा से ही एक महत्त्व पूर्ण स्थान रहा है और आज भी है | कलियुग में आते आते धर्म
की परिभाषा बहुत बदल गई है | विभिन्न सोच के कितने ही प्रभावशाली पुरुषों ने अपनी अपनी
सोच-समझ के अनुसार भोली-भाली जनता जनार्धन को धर्म के विभिन्न नाम दे कर अलग अलग
खेमों में बाँट दिया है | धर्म विभिन्न नामों से जाना जाने लगा है |
वैसे तो कलियुग के इस चरण में धर्म अलोप ही हो
गया है |
धर्म की परिभाषा लोगों ने अपने ही हिसाब से कर
रखी है | धरम क्या है कोइ समझने या समझाने की कोशिश भी नहीं करता |
अच्छे करम के बिना धर्म खोखली मन वहलाने वाली एक
बात है और अच्छे कर्मों में धर्म बिना किसी मान्यता व पूजा के समाहित है | सृष्टि रचना से भी
पहले प्रजापिता ब्रह्मा जी ने मानव कल्याण के लिए जो आवश्यक हो सकता था वोह चार वेदों
के रूप में भाषा-बद्ध कर दिया था।
इश्वर ने चौरासी लाख जीव योनि संसार में प्रगट की हैं और केवल मनुष्य को ही बहुत सी
समर्थता प्रदान कर रखी है कि वह नेक कर्मों से अपने अगंत को सुधार सके |
मनुष्य की यह समर्थता
ही उस के लिए भारी पड़ने लगती है जब वह अपने आप को कुछ अधिक ही समझदार और समर्थ
समझने लग जाता है | यदि समझ सात्विक अथवा सत्य आधारित हो तो गलत नहीं परन्तु जब
समझ स्वार्थी, झूठ आधारित,
अहंकार हिंसा और दूसरों के अहित जैसे अवगुणो से
भरपूर हो तो भगवान को किसी भी नाम या रूप में कभी भी प्रापत नहीं किया जा सकता
|
जो मनुष्य किसी दूसरे
का अनिष्ट नहीं करता, सत्य-वक्ता है, किसी तरह की भी हिंसा से दूर है, अपनी शक्ति
के अनुसार हर प्राणी के लिए मदद्गार है, लोभ-लालच, संसारिक मोह और अहंकार से
स्वभाविक तौर से ही दूर हो और किसी तरह की भी धार्मिक मान्यता के अनुसार पलकर बड़ा
हुआ हो अथवा कोई भी मान्यता से अनभिज्ञ हो, वह स्वभाविक तौर से सरल सीधा मनुष्य
प्रभु को अधिक प्रिय होता है | वह इतना सरल स्वभाव, बल-छल के बिना सत्य वक्ता होता
है कि इस सभ्य समाज के लोग तो उसे पागल या मूर्ख समझ कर उसकी हंसी उड़ाते हैं |
सत्य यही है कि
सच्चिनान्द स्वरूप प्रभु स्वयं भी पूर्ण सत्य हैं और सत्य ही उनको प्रिय है और
सत्यता और प्रेम-भाव से ही प्रभु का सानिध्य प्राप्त किया जा सकता है |
मनुष्य जन्म का उदेश्य
ही यह होता है कि वह पिछले जन्मों में हुए पापों के लिए प्राश्चित करता हुआ
दोष-निवारण कर सके और ईश्वर का सानिध्य प्रापत कर सके | और यह अच्छे कर्मों से और
इस सृष्टि के हर प्राणी में ईश्वर के अंश को महसूस करने से ही संभव हो सकता है |
यही सत्य धर्म है जिसे स्वाभविक तौर पर कोई विरला ही प्रभु कृपा व अपने पिछले
जन्मों के अच्छे फल स्वरुप प्रापत कर पता है |
शेष सभ तो पूजा पद्धिति
आदि के विधि-विधान हैं जो हर कोई नहीं कर सकता किन्तु वह करम सुधार की एक जन्म भर
नियम से निभाने वाली एक अच्छी विधि है और जो शाश्त्रोक्त भी है | किन्तु यह
विद्वान् पंडितों और साधु-सन्यासियों के बिना आम गृहस्थी तो कर ही नहीं सकता |
सरल स्वभाव, सत्य-वाणी
और सर्व-प्राणी प्रेम आदि कुछ सद्गुण ही पार लगाने के लिए उचित हैं| अहंकार,
स्वार्थ, लालच,
ईर्षा-द्वेष और मंमता से ऊपर अधिक
मोह अनुचित हैं और लाख-चौरासी में फिर से ले जाने का कारण बन सकते हैं |
"अव पछताए क्या
होत जब चिड़िआ चुग लिया खेत" | समय रहते जाग जाओ तो सुधार संभव है |
कितने लोग हैं जो
मुक्ति मार्ग को या भगवान को ढून्ढ पाते हैं?
बहुत से धर्म गुरु हर
सम्प्रदाय में अपने पीछे लगी भोली भाली जनता को अपने अपने तरीके से भगवत प्राप्ति
के मार्ग बताते हैं | आज से सौ साल पहले की वात करें तो कितने तपस्वी साधु-संत भी
होते थे जो कठिन तप-साधना से सिद्धि प्रापत कर लेते थे | जंगलों व पहाड़ी कन्दराओं
में रह कर, जंगली कन्द-मूल फल आदि खा कर, सर्दी-गर्मी सह कर, एकांत वास में रह कर
तपस्या करते और सिद्धि प्रापत कर लोक-हितार्थ काम व उपदेश करते थे | किन्तु अब ऐसा
नहीं रहा | जो साधु महात्मा प्रभु प्राप्ति के लिए तपस्या करते हैं वह इस भौतिक
संसार से अलग ही रहते हैं | हिमालय व गिर जैसे दूर पहाड़ों की कंदराएँ व गुफाएं ही
उनकी तपोस्थली होती है | ऐसे संत सुख-साधनो व भौतिक आडंवरो से दूर ही रहते हैं |
अब कलयुगी संत बाबाओं
का बहुत बोल-वाला है | ज्योतिषी हो, कथाकार हो या कोई सम्प्रदाय विशेष का मान्य हो
| ये सभी लोग गुरु विशेष बन भोली-भाली जनता-जनार्धन को अपने-अपने तरीके से
ज्ञान-वर्धक बना उनका विश्वाश जीत लेते हैं | हज़ारों नहीं लाखों अनुयाई बन जाते
हैं | अध्यात्मिक ज्ञान अथवा ईश्वर प्राप्ति के ऊपर ज्ञान गोष्टी भी चलती रहती हैं
किन्तु भौतिक सुख सुविधाओं में रहन-सहन वाले गुरु अथवा चेले संसारिक उलझनों में फस
कर सुख भोग की कामना से ऊपर उठ ही नहीं पाते | कितनो ने तो अपनी परिवारिक गद्दी
बना आने वाली पीढ़ीओं के लिए सुख-भोग के सुनिश्चित साधन बना दिए हैं |
हाय रे मेरे देश की
भोली जनता | आपको स्वार्थी, चंचल व शैतान
सोच व बुद्धि वाले लोग अपने हित के लिए वर्गला लेते हैं और आप का भोलापन और
अन्धविश्वाश आप को उनके वशीभूत होने पर मज़बूर कर देता है | आप ऐसे स्वयम्भु गुरु
लोगों को अपना भगवान व खुदा ही मान लेते हैं | कोई आप को जागृत करे भी तो कैसे?
हमारे शास्त्रों में प्रभु प्राप्ति के लिए सभ
विधि-विधान विस्तार पूर्वक चर्चित हैं किन्तु यदि कोई विद्वान् उनका व्याख्यान
किसी कथा के दौरान या ऐसे भी समझाता है तो सुनने वाले पहले तो कम ही होते हैं और
सुन कर भी समझने वाला और उस शिक्षा को जीवन चर्या में उतारने वाला तो शायद कभी कोई लाखों में भी न मिले | जैन मुनि बड़े
सत्य व कड़वे वचनों में यह पीड़ा व्यक्त करते हैं | सुनने वाले बड़ी श्रद्धा से सुनते
भी हैं किन्तु सभ उपदेश कानो के ऊपर से निकल जातें हैं | कथा वाचकों की कथन में
अच्छे उपदेश होते ही हैं किन्तु असर किस को कहाँ तक होता है ? हाज़री लग गई ,बड़ी
वात है | एक और बात, कुछ सामाजिक व राजनीतिक बड़ी हस्तियां और बड़ी दक्षिणा देने
वाले महत्व-पूर्ण लोग भी होते हैं | पहले तो ऐसे लोगों को सम्मानपूर्वक निमंत्रित
किया जाता है फिर व्यास पीठ की तरफ से इनको सम्मानित करने की विधि, जो अब एक
परम्परा ही बन गई है और निभानी भी पड़ती ही है | प्रबंधक लोगों का ध्यान तो इन्ही
हस्तियों पर केंद्रित रहता है | व्यास पीठ पर वैठे कथा-वाचक महोदय का तथा कथा सुनने आई जनता-जनार्धन का ध्यान खिच जाना
भी स्वाभिविक ही है तो ऐसे में कथा का श्रोत्रिय-लाभ किसी को क्या हो पाएगा ?
संस्कृत भाषा तो कुछ विद्वानों तक ही सीमित हो
कर रह गई है | संस्कृत में लिखे वेद-ग्रन्थ जनता-जनार्धन को समझना तो संभव नहीं
हैं | तुलसी जी रचित रामचरित्र मानस व अन्य प्रादेशिक भाषाओँ में रचित अनेकों
पवित्र पुस्तकों व ग्रंथों में भी बहुत कुछ है | किन्तु जो मैंने समझा है अति
उत्तम व श्रेष्ट ज्ञान श्री कृष्ण मुख-वाणी, गीता-ज्ञानेश्वरी में महर्षि वेदव्यास
जी द्वारा लिपि-वद्ध किया गया है | एक एक शब्द मूल्यवान सार्थक शिक्षा से भरपूर है
| बार बार अध्यन कर समझने और उसके कथना अनुसार कार्यरत होने के लिए प्रयास और
अभ्यास करते रहने की जरुरत रहती है | सरलतम उपाए है भगवत प्राप्ति का | घर में बैठ
कर अध्ययन करो--स्वयं पढ़ो, समझो, और अभ्यास रत रहो | जीवन सार्थक हो जायेगा|
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