चौरासी लाख योनि अर्थात अलग अलग तरह के प्राणी; देव, दानव,मनुष्य, पशु, पक्षी, जीव-जंतु अथवा कीड़े-मकौड़े, पेड़-पौदे; स्वर्ग आदि लोकों में, पृथ्वी पर और पानी के अन्दर व वायु में भी जो पैदा होते हैं, यह क्या और ऐसा क्यों है ? क्या कभी बिचार किया है कि इन अलग अलग योनि में जन्म क्यों और किस कारण से होते हैं या लेने पड़ते हैं ?
सनातन संस्कृति जो अब केवल
भारत के बचे छोटे भाग में अधरंग की बिमारी के मरीज़ की तरह बेवस पड़ी है, इस में ही इस का जबाब मिल सकता है और कहीं भी, संसार के किसी
कोने में किसी भी संस्कृति में नहीं मिलेगा। भारत देश जो हिन्दुकुश, हिमालया से दक्षिण
में हिन्द सागर तक, ईरान से बर्मा {मयांमार} से आगे तक फैला हुआ था अब सिकुड़ चुका है
और आगे भी इस को और छोटा करने के लिए, अपने ही आज़ाद देश के अनेकों स्वार्थी लोग लगे
हुए हैं।
श्री मद्भगवत गीता के पन्द्रवें अध्याय के दूसरे आधे श्लोक
में लिखा है,"कर्मा नूं बंधीने मनुष्य लोके" और इसका तात्पर्य है कि मनुष्य
का जो जन्म है इस में अच्छे-बुरे जो भी मनुष्य के द्वारा कर्म होते हैं या किये जाते
हैं तो उनका ही प्रभाव उसके अगले जन्म, सुख अथवा दुःख के लिए आधार बनते हैं।
सनातन ग्रंथों में मनुष्य के उत्थान के अनेकों उपाए अथवा
पतन के अनेकों कारणों का उल्लेख मिलता है।
मनुष्य को छोड़
कर जितना भी जीव-जंतु पैदा होता है वोह केवल कर्म-भोग में मिले सुख व दुःख भोगने के
लिए ही होता है। मनुष्य जन्म में भी दुःख सुख का भोग रहता है परन्तु मनुष्य के पास
कर्म सुधार की क्षमता भी रहती है।
मनुष्य के पास बुद्धि, एक विशेष गुण है। वह अपने हित और अहित
की भी समझ रखता है परन्तु मनुष्य के पास एक बड़ी दुर्वलता भी है और वह है उसका स्वार्थी
स्वभाव। मानव का स्वार्थी स्वभाव ही उसके पतन का सभसे बड़ा कारण बनता है।
हर जीव के मन में
प्रभु ने सृष्टि रचना और सृष्टि का सन्तुलिन बनाये रखने के लिए प्रजनन प्रक्रिया की
लालसा पैदा कर दी हुई है और एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था निर्मित कर दी गई जिसमें पुरुष-पत्नी
प्रेम, पुत्र-पुत्री मोह के साथ परिवार विस्तार और स्थाई सम्पति जैसे स्वार्थ प्रेरित
स्वाभाविक गुण भी मानव प्रकृति में उत्पन्न हुए।
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