____ देश का बिभाजन और ना होने देना ___
क्या इस देश में जो हिन्दु,सिख,जैन,बुद्ध और इस्लामीकरण से बच कर आये पारसी और अपने तौर-तरीके और अपनी मान्यताओं में जीने वाले आदिवासी लोग अपनी इस मातृ भूमि को फिर से टुकड़े होने से या पूर्ण इस्लामीकरण होने से बचाने के लिये कभी एक मत हो सकेंगे? समय हाथ से निकलता जा रहा है ।
क्या ऊंच-नीच,जाती-विरादरी,बड़े-छोटे अथवा अमीर-गरीब,राजनीतिक भेद भाव से हटके,अपने देश और धर्म,अपनी बहु-बेटियों की लाज की रक्षा और देश को और टुकड़े होने से बचाने अथवा दुनिया के नक़्शे में इस अपने सीमित सीमांओं में सिमिटे देश भारत को,देश में आज़ादी के बाद देश में बसी रह गई मुस्लिम आबादी,जो अब कई गुना बढ़ गई है,उस से,उनके तरह-तरह के इस्लामिकरण के हथकंडों से,देश को और अपनी सनातनी पहचान को बचाना जरुरी नहीं है ? मुस्लिम आबादी देश के बिभाजन के समय हिन्दू आबादी के सामने डेढ़ प्रतिशत थी, आज ७५ बर्ष बाद ३० प्रतिशत पार कर रही है और देश के इस्लामीकरण अथवा एक बार फिर टुकड़े करने के संकेत उभरने लगे हैं। समय रहते जाग जाओ नहीं तो फिर से काश्मीर जैसे हालात को झेलने के लिए तैयार रहो। अब की बार तो भाग कर कहीं जाने की जगह ही नहीं बचेगी। यदि ज़रूरी समझो तो अब भी जाग जाओ,अब भी एक-मत हो,सनातनी सोच के लोगों को आगे लाकर,बहुमत देकर देश की सरकार को सम्बिधान को देश के सभी जाती धर्म के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला बनाओ । इसके लिए मोदी सरकार{भाजपा} राष्ट्रीय सेवक संघ{आर. आर. ऐस.}विश्व हिन्दू परिषद् जैसी संस्थाओं को और भी मजबूत बनाना बहुत जरूरी है। गंगा-यमुनि तेह्ज़ीब और हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई के बहुत नाहरे हम लोगों को देश की सरकारों ने सुना-समझा दिए। परन्तु आज जो सुनने और समझने की जरुरत है वह है "टुकड़े-टुकड़े गैंग", ओवैसी भाई, वारिस पठान जैसे मुस्लिमों के इरादे और बोल, जो ऐसे येह लोग अब निडर हो खुलकर कहने लगे हैं। "३० करोड़ १०० करोड़ पर भारी पड़ेंगे","हम लड़के लेना जानते हैं","चिकन नैक को काटने की खुलेआम धमकी" क्या है यह सभ ? यह अलगवादी और कट्टरवादी प्रवृति के मुस्लिम, निडर और बेलगाम इस लिए हैं क्योंकि सरकार की और हिन्दू समाज की कमज़ोरियों को येह कौम के लोग समझते हैं। येह लोग "नमाज़" के नाम पर मस्जिदों में इकठा होते हैं और जुमे की नमाज़ में तो पूरी भीड़ भर जाती है। ऐसे मौके पर खुदा की इबादत नेक किसी काम के लिए होती हो तो अच्छी बात कही जा सकती है परन्तु हिन्दू "काफिरों" के बिरोध की भड़काऊ तकरीरें भी इसी जगह से होती है। इस कौम की एक जुटता अपने आप में एक उदाहरण है। क्या हिन्दू समाज के अंदर ऐसी एकता कहीं है ? इस कमज़ोरी को येह लोग जानते हैं. और इस लिए इसके पीछे एक ही कारण है, सरकारें चुनने वाला "मत" का अधिकार और मुस्लिम विरादरी की आपसी एकता जो हिन्दुओं में न कभी हुई और न ही आज है।
मुस्लिमों के काज़ी,मुल्लां,मौलवी व इमाम ही मुस्लिम समाज की आगवानी करते हैं और मुस्लिम समाज ऑंखें बंद कर उनके कहने के अनुसार एक हो कर वही करता है जो कहा जाता है । ताजा उदाहरण है,१९१८ की दिल्ली की केजरीवाल सरकार के एक मुस्लिम मंत्री अमानातुल्ला ख़ान ने केजरीवाल की सहमति से उसके सामने ही शाही मस्जिद के इमाम को १८००० रुपये और दिल्ली की दूसरी मस्जिदों के इमामों को भी बढ़ा कर तन्खाहें देने का ऐलान किया जिसका केजरीवाल द्वारा उसी समय उन्मोदन भी कर दिया गया और बदले में शाही इमाम ने मुस्लिम समुदाय को फरमान जारी कर दिया कि आने वाले चुनाव में "आप-पार्टी " को ही मुस्लिम वोट डालकर जिताना है और हुआ भी वोही। फिर नतीजा जो सामने आया,कुछ ही दिनों बाद सामने आया शाहीन-बाग़ का सुनिश्चित ड्रामा और दिल्ली के सोचे समझे दंगे और हिन्दुओ का कत्लयाम और बर्वादी और देश के टुकड़े करने जैसे अलग्वाद्ता के नाहरे। हिन्दु समाज आपस में लड़ता रहेगा,शायद कभी एक नहीं होगा और देखना वोह दिन दूर नहीं जब मुस्लिम हिन्दुओं पर भारी पड़ जायेंगे और भारत के फिर से टुकड़े करा देगें अथवा इस्लामिक देश बना देंगे और इस में सहयक होगी सोनिआ-कांग्रेस पार्टी, चीन के पिछलगुओं की कम्युनिस्ट पार्टी और छोटे स्वार्थी राजनैतिक दलों के नेता व उनके पिछलगू स्वार्थी लोग | इस देश को जब जब कभी हार झेलनी पड़ी है तो वोह इस लिए नहीं कि हमलावर ज्यादा शक्तिशाली होते होंगे असली कारण रहा रजवाड़ों और जनता-जनार्दन का आपसी असहयोग ।
इस्लामिक और अंग्रेजी हकूमतों के दौरान,पिछले हजार बर्षों में,इनके मुल्लां-मौलवी और हकूमतों के असह जुर्मों और कत्लयाम को अपने ऊपर की अनेकों पीढ़ी के बड़े बजुर्गों ने झेला है। सहन शीलता और दया भाव जैसे गुण हमारे संस्कार व धार्मिक प्रकृति की एक बहुत अच्छी देन है किन्तु क्या यह हर जगह,हर समय व हर किसी के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है? सामने कोई हिंसक प्राणी,कोई शेर-चीता व सांप आ जाये तो क्या करोगे ? हमारे संस्कार किसी प्राणी को मारना तो क्या कष्ट देने से भी परहेज़ करने की शिक्षा व प्रेरणा देते हैं परन्तु जब जान पर ही आ पड़े तो उचित प्रहार करना भी अनिवार्य हो जाता है। सामने वाला दुष्ट राक्षशी प्रवृति का हो तो उसके सामने खड़े होना जरुरी हो ही जाता है। जुर्म करने वाले के डर से उसका साथ देना एक बहुत बड़ी बुझदिली है। लालच में आकर अथवा जुरम व मौत के डर से अनेकों देशों और भारत के अनेकों लालची अथवा बुझदिल लोगों ने अपनी कुल की पहचान ही खो दी है। आज के मुस्लिम जो अफगानिस्तान,पाकिस्तान,बांग्लादेश,और दूसरे एशिया के देशों में फ़ैल रहे हैं इन के पुरखे सनातनी [हिन्दू] ही थे। इस्लामिक हुकमरानों और फकीरों ने सभी दूसरी धार्मिक मान्याताओं वालों को जिन्हें मुस्लिम "काफिर" कहते थे [और अब भी कहते हैं],हर तौर तरीका अपनाया और धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बनाने में लगे रहे और यह क्रम अब भी चल ही रहा है। इस्लामिक मान्यताएं कुछ अलग ही हैं। मुस्लिम लोगों की कथनी और करनी में बिरोधा-भास साफ दिखाई देता है। कटरता और निर्ममता जैसे राक्षसी अबगुण अधिकतर मुस्लिमों में मिलते हैं। यह मदरसा सिस्टम और धरम गुरु मौलाना ही सारे उत्पात की जड़ हैं। जन्नत क्या होती है ? किसी ने देखी तो है नहीं परन्तु काफिर को मारने से या काफिरों को मुस्लिम बनाने से मिलती है यह विश्वास जाहिल मुस्लिमों के दिल-दिमाग में भर दिया जाता है।
जैसे पांचों उंगलिओं बराबर नहीं होती ऐसे ही इन्सानी फ़ितरत भी सभ की अलग अलग होती है। मुस्लिमों में भी बहुत ऐसे लोग मिलेंगे जो शांतिप्रिय और दयावान होते हैं। मेरे ऐसे कई मित्र रहे हैं। बचपन से ही मदरसों में मुल्ला-मौलवी लोगों से पढ़ कर निकलने वाले लोग ही अधिक खतरनाक देखे गए हैं। स्कूलों से पढ़ने वाले बच्चों की बिचारधारा अलग होती है क्योंकि यह दूसरी जाती-धर्म के बच्चों के साथ मेल-जोल से रहने के आदि हो जाते हैं।
अंत में यही कहना है कि अब समय जागृत होने का है । देश की सरकार को सम्बिधान शंशोधन कर मुस्लिम कट्टरपंथिओं पर लगाम लगानी चाहिए और देशभगत और दयावान व शांतिप्रिय मुस्लिमों और दूसरे सभी लोगों को आतंकवादी व कट्टरपंथिओं से दूरी बना देश हित की सोचनी चाहिए।
खतरा सर पर मंडरा रहा है तो उस के लिए हर तरह से तैयार रहने
की सख्त ज़रूरत है ।
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