भारत देश की नई पीढ़ी अपने देश के इतिहास से अनजान , धार्मिक प्रणाली, और सामाजिक संस्कारों से हट कर, अपने देश की बहुमूल्य संस्कृति से अनभिज्ञ हो दूसरे देश-धर्मों, रहन-सहन व पहरावे को वेहतर समझ उनके
अनुयाई व नकलची बन अपने आधार मूल से विछड़ती जा रही है या यूँ कहें कि बिछड़ कर अलग दूसरी निराधार कुसंगतिओं में उलझती चली जा रही है। अपनी कुल रीती-निति, सामाजिक-समबन्ध, देश-प्रेम व सनातन धार्मिक निष्ठा को भूल आज की यह पीढ़ी के लोग अपने स्वार्थी माता-पिता की इच्छा अनुसार, डिग्री व नौकरी प्राप्त करने के लिए स्कूली किताबों की शिक्षा तक सिमिट कर रह गए हैं। जबकि स्कूल की शिक्षा प्रणाली से स्वदेसी धर्म, संस्कृति, संस्कार व वीर गाथाऐं अथवा देश-प्रेमिओं की कुर्वानिओं के विषय अलोप हो चुके हैं। बच्चे घर के बड़ों के संस्कारों को समझें या उनपर अमल करें उसकी जगह अलग तर्कें देने लगते हैं । सीमित साधनो वाले माता पिता की अब एक ही इच्छा रहती है कि उनके बच्चे अच्छी डिग्री ले कर अच्छी कमाई के साधन ढूंढ सकें। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हर किसी को अपनी प्रतिभा को निखारने की कोशिश करते रहना चाहिए । आर्थिक मजबूती के लिए भी उचित कोशिश बनी रहनी चाहिए। परन्तु जड़ काट दी जाये तो पेड़ का क्या हाल होता है ?
देश की आज़ादी के बाद की सरकारों की शिक्षा प्रणाली में देश-प्रेम, सनातन धर्म, देश की संस्कृति, सामाजिक संस्कार और पुरातन गर्वमय इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानी सपूतों की कुर्वानिओं जैसे शिक्षाप्रद बिषयों को एक विषय बनाने की कोशिश ही नहीं की गई। गाँधी, नेहरू परिवार और मुगलों के इतहास {शायद देश में रह गए मुस्लिमों को खुश रखने के लिए } को ही देश में शिक्षा का बहुमूलीय आधार बना, जनता को मूर्ख बना अपनी पारिवारिक गद्दी सुनिश्चित करने में लगे रहे।
हमारी अगली पीढ़ी संस्कार शून्य हो सामाजिक व परिवारिक रीती-रिवाजों से दिन व दिन दूर होती जा रही है जो एक बहुत बड़ा चिंता है। ऊपर से सिनेमा, टीवी और और सोशल मीडिया से मिल रही अति आधुनिक सत्यानाशी मनोरंजन शिक्षा। देश-प्रेम, धार्मिक निष्ठा, पूजा पद्धति जैसे पीढ़ी दर पीढ़ी चले आये संस्कार व संस्कृति के बिषय तो अधिक शहरी पढ़े-लिखे परिवारों से अलोप ही हो गए हैं। देश की मौजूदा सरकार को समझना चाहिए।
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