Monday, 21 October 2024

                                                                       धर्म की सत्यता को समझें  

 सनातन धर्म:

सनातन एक संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ होता है, "शाश्वत"। सनातन का अर्थ है, जो आदि अथवा प्रारम्भ से ही है सृष्टि की रचना के साथ ही से जो धर्म-पद्धति अथवा ईश्वर प्रार्थना की रीती प्रारम्भ हुई उसे ही कहा जाता है "सनातन धर्म" भावार्थ है कि जो सदा से है और सदा ही रहेगा वोह है "सनातन धर्म"

धर्म मात्र एक विश्वास अथवा मनमानी मान्यता नहीं होता।

सनातन ग्रंथों के अनुसार अच्छे कर्म ही धर्म का आधार होते हैं।

जिस मानव के मन में करुणा का भाव बना रहता है और जिस के मन में किसी भी जीव के प्रति दया का भाव होता है और प्रत्येक प्राणी में भगवान के अंश का आभास रखता है और यथा संभव सत्यता के साथ रहता है, वोह बिना किसी पूजा पद्धति को अपनाये भी धार्मिक ही होता है।

किसी भी जीव अथवा प्राणी को एक प्राण-वायु जीवित रखती है जिसे हम आत्मा कहते हैं। संसार के सब प्राणी समूह की आत्मा का सीधा सम्बन्ध परम-आत्मा, परमात्मा के साथ सदा ही बना रहता है। जैसे एक सूर्य की किरणें पूर्ण विश्व को प्रकाशमय कर देती हैं इसी तरह एक परमात्मा से निकलती हुई आत्म-ज्योति सम्पूर्ण प्राणियों की जीवन प्रदायनी बनी रहती है।

इसलिए मानव जीवन में कर्तव्य कर्म का विशेष महत्व रहता है।

सत्कर्मों से धर्म और दुष्कर्मों से अधर्म का सम्बन्ध माना जाता है। यह सत्कर्म अथवा दुष्कर्म ही भविष्य में आने वाले जन्मो का आधार बनते हैं।

सत्कर्मों से मनुष्य उच्च लोक स्वर्ग आदि की ओर जाता है ओर स्वर्ग सुख भोगने के बाद फिर मानव अथवा किसी अच्छी योनि में जन्म लेता है।

दुष्कर्म तो नरकों के द्वार ही खोलते हैं और अनेकों नीच योनियों में ना जाने कब तक भटकने के रास्ते खोल देते हैं।

मनुष्य जन्म बड़ी मुश्किल से प्राप्त होता है और मनुष्य जन्म में ही सत्कर्म करते हुए मुक्ति का मार्ग ढूँढा जा सकता है। सत्कर्म करते हुए और यथा संभव अपने इष्टदेव की पूजा बंदना करते हुए मानव अपना धर्म कर्म करता है।

सत्कर्म और धर्म कार्यों में दान का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है।                                                

 पृथ्वी लोक कर्म भूमि:

पृथ्वी लोक को भगवान ने कर्म भूमि की संज्ञा देकर मानव को यहाँ का निवासी बनाया है। मानव जन्म को एक दुर्लभ जन्म बताया गया है क्योंकि मनुष्य रूप में जन्म लेने वाला प्राणी ही अपने कर्मों का सुधार कर स्वर्गलोक अथवा जन्म-मरण से मुक्ति देने वाली सद्गति को प्राप्त कर सकता है। जन्म-मरण के चक्र से निकलने का मात्र एक रास्ता मानव जीवन से हो कर ही निकलता है। देव लोक के निवासी देवता भी सीधे सद्गति अथवा जीवन-मरण से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। पृथ्वी लोक पर मानव रूप में किये गए अच्छे पुण्य कर्मों के फल स्वरूप, स्वर्गादि ऊपर के लोकों में सुनिश्चित समय के लिए वहां प्राप्त सुख भोग कर, इनको भी कर्म अनुसार आगे किसी योनि में जन्म लेना पड़ता है।

इसी लिए कहते हैं की मानव योनि में जन्म लेने की लिए तो देवता भी तरसते हैं।                                                           

अच्छे कर्म करने वाले मनुष्य योनि के लोग, पृथ्वी पर अपना जीवन-काल पूरा कर लेने के बाद पृथ्वी के ऊपर के स्वर्ग आदि लोकों में वहां का सुख भोगने के लिए एक सुनिश्चित समय के लिए ले जाये जाते हैं। फिर उनका आगे की योनि में जन्म होता है और मानव जीवन में एकत्रित किये सभी अच्छे-बुरे कर्मों का हिसाब आगे चलता रहता है। 

मनुष्य के लिए कर्म क्या होता है और धर्म से कर्म का क्या सम्बन्ध बनता है ऐसे समझने के लिए हमें अति उत्तम पवित्र ग्रन्थ, "श्री मद्भगवत गीता" जो स्वयं श्री हरीमुख बाणी है, जिस का प्रादुर्भाव भगवान श्री विष्णु के सोलह कला सम्पूर्ण अवतार वासुदेव श्री कृष्ण के श्री मुख से कुरूक्षेत्र की युद्ध भूमि पर कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत का युद्ध शुरू होने के समय हुआ था।               

युद्ध के लिए कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने सामने थी। उस बड़े महाभारत युद्ध में श्री कृष्ण ने स्वयं शस्त्र का प्रयोग नहीं करना था। उन्होंने अर्जुन की इच्छा के अनुसार उसका सारथी बनना स्वीकार किया था और वही वोह कर रहे थे। श्री कृष्ण अर्जुन के सारथी बन उस के रथ के घोड़ों को हाँक रहे थे।

उस युग में युद्ध आमने-सामने का होता था। तीर, तलवार, गदा और भाले जैसे अनेकों शस्त्रों से ही आमने-सामने होकर लड़ा जाता था। परन्तु भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, अर्जुन और करण जैसे बहुत से वीर पुरुष धनुष से छोड़े जाने वाले दिव्या और बड़े विध्वंसक शस्त्रों का प्रयोग भी करना जानते थे।

महाभारत युद्ध शुरू होने के समय युद्ध भूमि में जब अर्जुन ने अपने सामने युद्ध के लिए खड़े हुए अपने गुरु द्रोणाचार्य, परिवार के सबसे बड़े वृद्ध पुरुष पितामह भीष्म को और दूसरे सभी परिवारजनों को भी देखा तो उसके अंग शिथिल पड़ गए थे और उसने अपने ही बड़ों और परिवारजनों के साथ युद्ध करने से साफ मना कर दिया था।

अर्जुन भगवान श्री कृष्ण की भुआ "कुंती" के पुत्र थे और दोनों में बहुत स्नेह भी था।

श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्म और कर्तव्य का ज्ञान देते हुए समझाया था कि समय और स्थिति के अनुसार मनुष्य को अपना फैसला करना चाहिए। रिश्तों के मोह से ऊपर उठ कर समय के अनुसार कर्तव्य का पालन करना चाहिए।

Thursday, 17 October 2024

डॉ. शिव राम भागी द्वारा सनातन ज्ञान वर्धक - २

डॉ शिव राम भागी द्वारा

                                सनातन ज्ञान वर्धक - २ 

          रोचक कहानियां                      सरल भाषा में 

सनातन धर्म, हिन्दू धर्म अथवा वैदिक धर्म :

1.    धर्म की सत्यता को समझें  

 सनातन धर्म:

सनातन एक संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ होता है, "शाश्वत"। सनातन का अर्थ है, जो आदि अथवा प्रारम्भ से ही है सृष्टि की रचना के साथ ही से जो धर्म-पद्धति अथवा ईश्वर प्रार्थना की रीती प्रारम्भ हुई उसे ही कहा जाता है "सनातन धर्म" भावार्थ है कि जो सदा से है और सदा ही रहेगा वोह है "सनातन धर्म"

धर्म मात्र एक विश्वास अथवा मनमानी मान्यता नहीं होता।

सनातन ग्रंथों के अनुसार अच्छे कर्म ही धर्म का आधार होते हैं। का आभा

जिस मानव के मन में करुणा का भाव बना रहता है, जिस के मन में किसी भी जीव के प्रति दया का भाव होता है, प्रत्येक प्राणी में भगवान के अंश को समझता है और यथा संभव सत्यता के साथ रहता है, वोह बिना किसी पूजा पद्धति को अपनाये भी धार्मिक ही होता है।

किसी भी जीव अथवा प्राणी को एक प्राण-वायु जीवित रखती है जिसे हम आत्मा कहते हैं। संसार के सब प्राणी समूह की आत्मा का सीधा सम्बन्ध परम-आत्मा, परमात्मा के साथ सदा ही बना रहता है। जैसे एक सूर्य की किरणें पूर्ण विश्व को प्रकाशमय कर देती हैं इसी तरह एक परमात्मा से निकलती हुई आत्म-ज्योति सम्पूर्ण प्राणियों की जीवन प्रदायनी बनी रहती है।

इसलिए मानव जीवन में कर्तव्य कर्म का विशेष महत्व रहता है।

सत्कर्मों से धर्म और दुष्कर्मों से अधर्म का सम्बन्ध माना जाता है। यह सत्कर्म अथवा दुष्कर्म ही भविष्य में आने वाले जन्मो का आधार बनते हैं।

सत्कर्मों से मनुष्य उच्च लोक स्वर्ग आदि की ओर जाता है ओर स्वर्ग सुख भोगने के बाद फिर मानव अथवा किसी अच्छी योनि में जन्म लेता है।

दुष्कर्म तो नर्कों के द्वार ही खोलते हैं और अनेकों नीच योनियों में ना जाने कब तक भटकने के रास्ते खोल देते हैं।

मनुष्य जन्म बड़ी मुश्किल से प्राप्त होता है | देवता भी मानव जन्म के लिए इच्छा रखते हैं क्योंकि मुक्ति का मार्ग यहीं से मिलता है। मुक्ति क्या है ? जन्म मरण और जीवन के कष्टों से सदा के लिए मुक्ति। मनुष्य जन्म में ही सत्कर्म करते हुए मुक्ति का मार्ग ढूँढा जा सकता है। सत्कर्म करते हुए और यथा संभव अपने इष्टदेव की पूजा बंदना करते हुए मानव अपना धर्म कर्म करता है।

सत्कर्म और धर्म कार्यों में उचित दान का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है।