धर्म की सत्यता को समझें:
सनातन धर्म:
सनातन एक संस्कृत
का शब्द है जिसका अर्थ होता है, "शाश्वत"। सनातन का अर्थ है, जो आदि अथवा प्रारम्भ से ही है । सृष्टि की रचना के साथ ही से जो धर्म-पद्धति अथवा ईश्वर प्रार्थना की रीती प्रारम्भ हुई उसे ही कहा जाता है "सनातन धर्म"। भावार्थ है कि जो सदा से
है और सदा ही रहेगा वोह है "सनातन
धर्म" ।
धर्म मात्र एक विश्वास अथवा
मनमानी मान्यता नहीं होता।
सनातन ग्रंथों के अनुसार अच्छे
कर्म ही धर्म का आधार होते हैं।
जिस मानव के मन में करुणा का
भाव बना रहता है और जिस के मन में किसी भी जीव के प्रति दया का भाव होता है और
प्रत्येक प्राणी में भगवान के अंश का आभास रखता है और यथा संभव सत्यता के साथ रहता
है, वोह बिना किसी पूजा पद्धति को अपनाये भी धार्मिक ही होता
है।
किसी भी जीव अथवा प्राणी को एक
प्राण-वायु जीवित रखती है जिसे हम आत्मा कहते हैं। संसार के सब प्राणी समूह की
आत्मा का सीधा सम्बन्ध परम-आत्मा, परमात्मा के साथ सदा ही बना
रहता है। जैसे एक सूर्य की किरणें पूर्ण विश्व को प्रकाशमय कर देती हैं इसी तरह एक
परमात्मा से निकलती हुई आत्म-ज्योति सम्पूर्ण प्राणियों की जीवन प्रदायनी बनी रहती
है।
इसलिए मानव जीवन में कर्तव्य
कर्म का विशेष महत्व रहता है।
सत्कर्मों से धर्म और
दुष्कर्मों से अधर्म का सम्बन्ध माना जाता है। यह सत्कर्म अथवा दुष्कर्म ही भविष्य
में आने वाले जन्मो का आधार बनते हैं।
सत्कर्मों से मनुष्य उच्च लोक
स्वर्ग आदि की ओर जाता है ओर स्वर्ग सुख भोगने के बाद फिर मानव अथवा किसी अच्छी
योनि में जन्म लेता है।
दुष्कर्म तो नरकों के द्वार ही
खोलते हैं और अनेकों नीच योनियों में ना जाने कब तक भटकने के रास्ते खोल देते हैं।
मनुष्य जन्म बड़ी मुश्किल से
प्राप्त होता है और मनुष्य जन्म में ही सत्कर्म करते हुए मुक्ति का मार्ग ढूँढा जा
सकता है। सत्कर्म करते हुए और यथा संभव अपने इष्टदेव की पूजा बंदना करते हुए मानव
अपना धर्म कर्म करता है।